शायरी- उल्फत में जान निकल जाए

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गिरके ना ये फिर संभल जाए
उल्फत में जान निकल जाए

रूह का दीपक तो जला
ये जिस्म चाहे पिघल जाए

मर्जी हो तेरी तो आ जाओ
मेरा आशियां ये बदल जाए

कश्ती समंदर में कैसे रूके
किनारे से जो फिसल जाए

©RajeevSingh

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