महबूबा शायरी

शायरी – कभी गली में वो दिखती नहीं

कभी गली में वो दिखती नहीं ये उम्मीद भी कितनी बंजर है

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इश्क का ये उदास मंजर है
दर्द सीने में गड़ा खंजर है

वो हुस्न पिंजरे में बंद पंछी है
इधर दिल रोता घर के अंदर है

आंखें झरने की तरह गिरती हैं
जिस्म में भर गया समंदर है

कभी गली में वो दिखती नहीं
ये उम्मीद भी कितनी बंजर है

©RajeevSingh

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