शायरी – एक महबूबा की दुआएं रोती हैं

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आसमान टूटता है, घटाएं रोती हैं
जब दिल टूटता है, निगाहें रोती हैं

रिश्तों के बाजार में भीख मांगती
प्यार की कितनी सदाएं रोती हैं

तनहाई के आलम में तकिए पर
एक महबूबा की दुआएं रोती हैं

दूर शहनाई की आवाज सुनकर
किसी की मातमी फिजाएं रोती हैं

©राजीव सिंह शायरी

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