शायरी – सांसों की कशमकश में कितने शहर बदल चुके

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ऐ जिंदगी तेरे इश्क में पागल भी हम हो चुके
कांटों से नहीं, हम यहां फूलों से घायल हो चुके

अपने हमें समझाते रहे दुनिया की वो रवायतें
हम समझ न पाए तो अपने घर से निकल चुके

मोम सा जलते रहे हम चांद की खातिर रातभर
बुझ गए हैं आज हम जो पूरी तरह पिघल चुके

एक जगह रुकने से अब घुटता है क्यों दम मेरा
सांसों की कशमकश में कितने शहर बदल चुके

©राजीव सिंह शायरी

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