शायरी – साथ में तुम हो फिर भी उलझन

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साथ में तुम हो फिर भी उलझन
न रहो तुम तो फिर भी उलझन

जीवन का रस्ता कितना अंजाना
जितना चला, बढ़ती गई उलझन

मन में सवालों का अंत नहीं कोई
जितने जवाब उतनी नई उलझन

फर्श पे देखा था अर्श का सपना
अर्श पे पहुंचा तो और भी उलझन

अर्श – आकाश

©राजीव सिंह शायरी

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