शायरी – ये दिल झरनों सा गिरकर चोट खाता रहा

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टूटा चांद रातभर दर्द को सहलाता रहा
किसी का चेहरा आंखो में आता जाता रहा

अधूरे अरमानों की चिताओं को सजाकर
आग को कोई खामोशी से सुलगाता रहा

दुखों की पहाड़ियों की चोटी पर चढ़कर
ये दिल झरनों सा गिरकर चोट खाता रहा

ये कैसी सरहद इस जमाने ने खींच रखी है
जिसे पार करने के लिए वो जान गंवाता रहा

©राजीव सिंह शायरी

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