शायरी – चाहकर भी मर न सका मैं, जीवन ने जीवनभर ठेला

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सबका अपना अपना मेला
कोई भीड़ में, कोई अकेला

झूठे प्यार की उसकी बातें
दिल पे हमने बरसों झेला

बहुत देर में समझ में आया
ऐसा उसने खेल था खेला

चाहकर भी मर न सका मैं
जीवन ने जीवनभर ठेला

©राजीव सिंह शायरी

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