परिंदा शायरी

शायरी – जिस शहर में सच्चा हमसफर न मिलेगा

जिस शहर में सच्चा हमसफर न मिलेगा मुसाफिर वहां सफर में कहां तक चलेगा हर जगह जहां बेवफाओं की महफिलें हैं एक तन्हा उस मंजर में कहां तक टिकेगा

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जिस शहर में सच्चा हमसफर न मिलेगा
मुसाफिर वहां सफर में कहां तक चलेगा

हर जगह जहां बेवफाओं की महफिलें हैं
एक तन्हा उस मंजर में कहां तक टिकेगा

मकानों के कारवां में फंसके फड़फड़ाया
गलियों की कैद में परिंदा कहां तक रहेगा

चांद सूरज भी जहां अपना वजूद खो चुका
उस शहर में दीया फिर कहां तक जलेगा

©राजीव सिंह शायरी

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