हीर रांझा – 31 – हीर और सेहती ने मिलकर बनाई योजना

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सेहती हीर के पास गई और जोगी रांझा का संदेशा उसे सुनाया। कहा, ‘तुमने उससे भैंसों की रखवाली करवाई। प्यार किया और धोखा देकर सैदा से शादी कर ली। वह फकीर बदन पर राख मलकर अब दर-दर भटक रहा है। तुमको जाकर अपने प्रेमी से मिलना चाहिए।’

हीर बोली, ‘मैं उससे जाकर मिलूंगी और उसके सारे दुख को अपने सर ले लूंगी।’ हीर ने रांझा से मिलने का फैसला किया। वह नहाने के बाद जाने के लिए तैयार हो गई। कालाबाग के बगीचे में रांझा ने जैसे ही हीर को आते देखा, उसने दूर से ही उसे पहचान लिया।

हीर आते ही रांझा के गले लग गई। ‘रांझा, यह जुदाई मैं बरदाश्त नहीं कर पा रही हूं। मेरा दिल भट्टी की तरह जलता है। मैं तुम्हारी अमानत सुरक्षित तुम्हारे पास ले आई हूं। मैंने अब तक तुम्हारे सिवा किसी और के बारे में सोचा तक नहीं। चलो यहां से कहीं दूर भाग चलें।’

जलते दीए में पतंगा जल जाता है तो लौ और भी भड़क उठती है। रांझा और हीर के मिलन पर प्यार और भी दीवानगी से भर उठा। दोनों की नसों में प्यार का जहर चढ़ता रहा। दोनों के मिलन की खुशबू दूर दूर तक फैल रही थी।

लेकिन हीर को घर लौटना भी था। जल्दी ही रांझा से हीर को विदा लेना पड़ा। घर लौटते समय सेहती से हीर सलाह करने लगी, ‘मैं रांझा से फिर मिलना चाहती हूं। यह तुम ही कर सकती हो। तुमको प्रेमी मुराद से मिलना है और मुझे रांझा से। कोई ऐसा रास्ता निकालते हैं जिससे हम दोनों अपने प्रेमी से हमेशा के लिए मिल जाएं।’

हीर के कहने पर सेहती ने एक योजना बनाई। वह मां के पास गई और बोली, ‘मां, हीर की तबीयत खराब रहती है। वह दिन पर दिन दुबली होती जा रही है। दिनभर पलंग पर वह मरीज जैसी पड़ी रहती है। खाती है न पीती है। ऐसे में तो दुख से वह मर जाएगी। बहू तो घर की शोभा होती है। लेकिन जब से हीर आई है तबसे हमारा घर परेशानियों से घिरा है। यह अपने साथ हमारी बदकिस्मती लेकर आई है। पति सैदा से तो यह दूर भागती है। वह कुछ इसे कहता भी नहीं।’

सेहती मां को हीर की तकलीफों के बारे में समझा ही रही थी कि तब तक योजना के मुताबिक हीर वहां आई और सास से कहने लगी, ‘मां जी, घर के अंदर रहते रहते मन ऊब गया है। मैं सेहती के साथ बाग बगीचे खेतों में घूम आऊं। घर में बैठे रहने से जी घबराता है।’

हीर की सास मसले पर अभी सोच ही रही थी कि सेहती बोल पड़ी, ‘चलो हीर, बाहर घूमने निकलते हैं। मां, हम घर की चारदीवारी में गुलाब की कली को मुरझाते नहीं देख सकते।’

सेहती की मां यह सुनकर राजी हो गई और कहने लगी, ‘जाओ घूम आओ, हो सकता है इससे हीर की तबीयत में कुछ सुधार हो। लेकिन इसे अपनी सहेलियों के साथ ही रखना। हीर, तुम घर के बाहर जा रही हो तो बहू होने की मर्यादा का ख्याल रखना। कुछ ऐसा वैसा मत करना कि हमारी बदनामी हो।‘

सेहती अगली सुबह सहेलियों और हीर के साथ बाहर घूमने निकली। सभी बगीचे में जाकर नाचने गाने लगे। तभी सेहती ने चुपके से हीर के पैर में एक कांटा चुभा दिया। योजना के मुताबिक हीर रोने चिल्लाने लगी, ‘मुझे सांप ने काट लिया, बचाओ, कोई मेरी जान बचाओ।’ हीर बेहोश होने का नाटक करने लगी।

सेहती भी चिल्लाने लगी, ‘बहू को काला सांप ने काट लिया।’ सब हीर को उठाकर घर ले आए। जादू मंतर करने वालों से लेकर हकीमों, फकीरों तक को बुलाया गया। लेकिन हीर ठीक नहीं हो पाई। उसकी सास कहने लगी, ‘लगता है हीर अब नहीं बचेगी।’ तब सेहती ने मां को सलाह दिया, ‘इस सांप के जहर को सिर्फ एक ही जोगी मार सकता है। वह कालाबाग में रहता है। उसकी बांसुरी की धुन में जादू है। जहरीले सांप, भूत प्रेत शैतान तक उससे डरते हैं।’ यह सुनकर हीर के ससुर ने सैदा से कहा, ‘जाओ बेटा, बहू की जान बचानी है तो उस फकीर को ले आओ।’

सैदा जोगी रांझा के पास दौड़ा दौड़ा पहुंचा। वह हीर की चिंता में पीला पड़ गया था। उसने जोगी से कहा, ‘मेरी हीर को सांप ने काट लिया। बहुत इलाज के बावजूद ठीक नहीं हुई। मेरी बहन कहती है कि आप उसे ठीक कर सकते हैं। हमारे साथ चलिए।’

लेकिन रांझा जाने को तैयार नहीं हुआ। सैदा ने उसके पैर पकड़ लिए लेकिन रांझा ने उसे झटक दिया और उसे पीटने लगा। सैदा वहां से भागा भागा घर लौटा और पिता से अपने साथ हुई बदसलूकी के बारे में बताया। इस पर उसके पिता गुस्से में आ गए और जोगी को सबक सिखाने की बात करने लगे। लेकिन सेहती ने उनको रोक लिया और हीर की जान का वास्ता देकर जोगी को मनाकर लाने को कहा।

सेहती की बात मानकर पिता जोगी रांझा के पास गए तो वह भी आने को तैयार हो गया और इस तरह से खेराओं ने अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मार ली। कहानी आगे पढ़ें।

कहानी शुरू से पढ़ें।
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