अपने दिल की सारी ख्वाहिशों को मसल चुके

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जिंदगी तेरे इश्क में कितनी दूर हम चल चुके
मिला सुकूं कहीं नहीं, कितने शहर बदल चुके

घर की उम्मीदों को पूरी करने की कोशिश में
अपने दिल की सारी ख्वाहिशों को मसल चुके

आग बुझाने की कोशिश में सांस हम लेते रहे
सीने में उठते धुएं से कतरा कतरा जल चुके

मोम से ये वजूद मेरा बहुत जल्दी पिघलता है
दुख के इतने सांचों में अब तक हम ढल चुके

©rajeevsingh            शायरी

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