आशिक शायरी

shayari – मंजिल सामने थी मगर रास्ते कहीं खो गए

शायरी मंजिल सामने थी मगर रास्ते कहीं खो गए हम तुम अपने घरों के वास्ते कहीं खो गए एक बार दूर हुए तो फिर कभी मिल न सके मजबूरियों में दो दिल के रिश्ते कहीं खो गए

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मंजिल सामने थी मगर रास्ते कहीं खो गए
हम तुम अपने घरों के वास्ते कहीं खो गए

एक बार दूर हुए तो फिर कभी मिल न सके
मजबूरियों में दो दिल के रिश्ते कहीं खो गए

निगाहों में छुपा दर्द ये जमाना देख न सका
महफिल में इस तरह हम हंसते कहीं खो गए

अपनों ने इतनी उलझनों में फंसा दिया कि
सारे सपने आहिस्ते आहिस्ते कहीं खो गए

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