प्यार हो भी जाए तो बेटियों को शादी का फैसला लेने का हक कहां – निकिता की लव स्टोरी

मैं निकिता हूं। मेरी शादी लगभग तय हो चुकी थी। एंगेजमेंट के बाद मैं लड़के से बात कर चुकी थी। इसके बाद शादी की डेट फाइनल भी हो गई थी। सारी तैयारी होने के बाद शादी से 28 दिन पहले ही इस रिश्ते को मेरे पापा ने तोड़ दिया।

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मैं भी इस शादी से खुश नहीं थी और मेरे मां-पापा एक तरह से जबर्दस्ती मेरी शादी कर रहे थे लेकिन पापा और फैमिली की खुशी के लिए मैंने वो सब किया जो वो चाहते थे। ये सोचकर कि एडजस्ट करने की कोशिश करूंगी या फिर ये सोचा कि यही मेरा भाग्य है। मैंने अपने आपको इस शादी के लिए मानसिक रूप से तैयार कर लिया था।
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मैंने यही सोचा कि बेटी होने के नाते मेरा फर्ज बनता है कि पापा की पसंद को अपनी पसंद बना लूं। मेरी रिश्ता जहां हो रहा था, वो लड़के वाले धोखा दे रहे थे इसलिए पापा ने ये रिश्ता तोड़ दिया। आप सोच भी नहीं सकते कि शादी टूटने के बाद कैसा फील होता है? मेरे पापा ने जब ये रिश्ता तोड़ दिया तो मुझे भी दुख हुआ।
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लेकिन हमारे परिवारों में हम अपने दुख को अपनों से छुपाते हैं। मैंने भी कभी फैमिली को ये फील नहीं होने दिया कि इस शादी के टूटने से मुझे तकलीफ हुई है। फैमिली के लिए जीती हूं, हंसती हूं, रोती हूं, अपनी जिंदगी तो जैसे है ही नहीं। ऐसे परिवारों और बेटियों की जिंदगी में प्यार के लिए स्पेस कहां। प्यार हो भी जाए तो शादी का फैसला लेने का हक कहां?

यही है हमारे जैसी बहुत सारी बेटियों की जिंदगी की कहानी। शायद…आप क्या कहते हैं?

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