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जिम्मेदारियों को बोझ तले दबी रूह का प्यार – कुमुद की कहानी

मुझे नहीं पता कि मेरी स्टोरी का क्या अन्त है? पर इतना पता है कि जब तक ये सांसे चल रही है, मैं सिर्फ उनकी ही रहूंगी और हर जगह साथ हूं- ऑफिस में भी और ज़िंदगी में भी। भले ही कितनी ही परेशानी आये, साथ नहीँ छोड़ूंगी उनका। दोस्तों दुआ कीजिये कि मेरा साथ उनसे कभी न छूटे। साथ छूटा तो मैं जी नहीं पाऊँगी। ये बचपने का प्यार नहीं है...समझदारी की उम्र में प्यार हुआ है जो कभी मर नहीं सकता।

मैं 27 साल की कुमुद हूँ। मैं एक ऐसी लड़की हूँ जो यूपी के एक छोटे कस्बे में एक नॉर्मल परिवार में पली बढ़ी। चार बहन, दो सबसे छोटे भाई थे इसलिए घर से हमेशा समाज के लोग क्या कहेंगे, यही सीख मिली तो मेरे मन में शुरू से मेरी इज्जत हर चीज रही। शुरू से घर की हर बुरी परिस्थिति देखी तो बस यही सोचकर कभी गलत संगत में नहीं पड़ी और मैं पढ़ाई में ठीक थी। जब मैंने 12वीं पास की तो सिर्फ 16 साल की थी। यूपी के ही एक शहर में पापा नौकरी करते थे, वहाँ अपने छोटे भाई और पापा के साथ रहने लगी।

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पापा की तबियत ठीक न रहने के कारण खुद की पढ़ाई के साथ साथ घर और बाहर दोनों सब सम्भाल लिया। सब छूट मिली शहर आकर, फिर भी बस इज़्ज़त ही सबकुछ रही। कई लड़कों ने बात करने की कोशिश की लेकिन मैंने बात नहीं की। मैंने सोच रखा था कि जहाँ घरवाले शादी करेंगे वहीं करुँगी, जैसे दोनों दीदी की हुई है, सिंपल तरीके से वैसे ही जिससे कोई ये न कह पाये कि इसे पढ़ाया तो अपनी पसंद की शादी कर ली।
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फिर धीरे धीरे घर की ज़िम्मेदारियां बढ़ती गई। पापा की बीमारी की वजह से घर बाहर दोनों जगह को देखना। छोटी बहन की पढ़ाई मैं ही देखती थी। मां गांव के घर को संभालती थी और मैं शहर के घर को। मैं बस घर में ही उलझती गयी और छोटी उम्र में जिम्मेदारियां संभालने की वजह से वह सब नहीं कर पाई जो अन्य लड़कियां करती हैं। धीरे धीरे फिर ऐसा भी समय आया कि घर में माँ पापा के बहुत झगड़े होने लगे। हर रोज रात रातभर नशे में रोज रोज के झगड़े से शादी से मेरा भरोसा हट गया। मैं सोचने लगी कि ऐसे हालात में अपना घर बसाकर नहीं जी सकती।
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मैंने पापा से यही बोला कि ड्रिंक छोड़ दो, जहाँ बोलोगे शादी कर लूंगी पर आपके ड्रिंक न छोड़ने पर ऐसे हालात में शादी करके नहीं जा सकती हूं।
फिर एक दिन ऐसा आया कि पापा हम लोगों को छोड़कर अलग रहने लगे तो मेरा शादी पर से पूरी तरह विश्वास उठ गया और ज़िन्दगी जीने की इच्छा ही मर गयी। फिर मेरी ज़िन्दगी का एक ही मकसद रहा कि नौकरी करके छोटे भाई, बहन और माँ को संभालना ताकि उनको उम्र के इस पड़ाव पर आकर मजदूरी या किसी के घर का काम न करना पड़े।
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तब मैं बहुत डिप्रेशन में गई। इसके बाद भी स्कूल में पढ़ना, ट्यूशन पढ़ाना, फिर पार्लर जाकर वहाँ काम करना, रात में आकर सिलाई करना, कैसे भी करके बस घर चलाना था और पापा को वापस लाना था। इस बीच बहुत सी परेशानियां देखी। छोटे भाई हॉस्टल में थे। उनको घर की परेशानियां नहीं बताते थे कि उनका पढ़ाई से ध्यान न हट जाए। बच्चे ही तो थे तब लगभग 6 महीने बाद बहुत कोशिशों बाद पापा घर वापस आये पर उनकी ड्रिंक कम न हुई।
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पापा के वापस आने की खुशी बहुत हुई। मानो एक टूटा हुआ घर सम्भल गया कैसे भी। फिर मेरे छोटे भाई ने फेसबुक पर मेरा अकाउंट बनाया। लोगों से जुड़ी और लोगो को समझा-जाना। बहुत से लोग ऐसे मिले जिन्होंने ज़िन्दगी भर का साथ भी माँगा या आगे बात करने को कहा पर कोई फर्क न पड़ा। जिसने भी प्यार की बात की ब्लॉक कर दिया क्योंकि इज़्ज़त का और समाज के लोगों का डर था कि मुझसे कोई गलती न हो।
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फिर संविदा के नाम पर मेरी सरकारी नौकरी लगी, वो भी पैसे देकर पर ये सोचकर कर्ज लेकर दे दिए कि नौकरी ज़िन्दगीभर की है। नौकरी करने के दौरान मैं उस इंसान से मिली जिससे मैं अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करने लगी हूँ। मैं उनके अंडर में काम करने के लिए लगाई गई थी। शुरू में बॉस ने उनके बारे में बताया गया कि वो इंसान सही नहीं है पर मैंने उनके विचार पर ध्यान नहीं दिया। मुझे लगता था कि वो इंसान सही है फिर क्यों उनको गलत बताया जा रहा है। फिर पता चला कि बॉस से उनकी पटती नहीं है।
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2015 में बहुत बीमार पड़ी तो ऑफिस से मुझे हॉस्पिटल से जाया गया, उस वक्त उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा तो मुझे अपनापन सा लगा। ठीक होने के बाद उनसे वाट्सऐप पर बात होने लगी। उनका किसी से सात साल से इश्क रहा था जो टूट गया था इस वजह से वो दुखी रहते थे और हमेशा उसी की चर्चा करते थे। दोनों एक ही कास्ट के थे लेकिन लड़की के घरवालों ने उसकी शादी कहीं और कर दी थी। वो टूटे हुए थे। मुझे उनसे बात करना अच्छा लगता था और उनके पास्ट से मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
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जनवरी 2016 में मेरे पापा की अचानक डेथ हो गई। मैं बहुत बुरी तरह से टूट गयी थी। सब बन्द कर दिया था। फेसबुक, वाट्सऐप सब अचानक छोड़ दिया। घर की पूरी जिम्मेदारी आ गयी थी पापा के जाने से। पापा की तेरहवीं में वो मेरे घर आए थे। वक़्त गुजरने के साथ-साथ उनको भी मुझसे मोहब्बत बढ़ने लगी और मेरी आदत होने लगी। हम दोनों के फिजिकल रिलेशन बन गए थे। मैं शादी के बाद ही यह सब पति के साथ करना चाहती थी लेकिन उनकी जिद के आगे मेरा प्यार झुक गया। मैं इतनी पढ़ी लिखी, समझदार होकर भी उनको और खुद को रोक नहीं पाई। उन्होंने कहा कि वो मुझे पाना चाहते हैं और प्यार करते हैं।
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वो कहते थे कि मैं किसी और से शादी न करूं और करूं भी तो उनसे मिलती रहूं लेकिन यह मेरे लिए मुश्किल वक्त था। मैं किसी और से शादी के बाद उनसे मिल नहीं सकती थी और शादी नहीं करती हूं तो समाज और दुनिया मुझेे और मेरे घरवालों को जीने नहीं देगी, ये सब मैं जानती थी इसलिए उनको कहा कि आप अपने कास्ट में शादी कर लो, बीवी-बच्चे होंगे तो सब ठीक हो जाएगा लेकिन वे नहीं माने।
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हम दोनों के रिश्ते पति-पत्नी की तरह हो गए हैं। हम काफी समय साथ बाहर गुजारते हैं। 2017 के मार्च में हम दूसरे शहर में गए और एक साथ होटल में रहे। दुनिया की नजर में हम भले पति-पत्नी नहीं थे लेकिन वो यादें मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत पल थे जब हम एक साथ दुनिया को भुलाकर अपना पल जी रहे थे। अगले महीने अप्रैल में हम दोनों के बीच जबर्दस्त झगड़ा हो गया। मुझे कुछ गलतफहमी हो गई थी। उन्होंने नाराज होकर मुझे वाट्सऐप फेसबुक पर ब्लॉक कर दिया और ऑफिस में बात करनी बंद कर दी।
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मुझे लगा कि मेरी दुनिया खत्म हो गई है इसलिए मैंने उनसे बहुत रिक्वेस्ट की कि अब मैं झगड़ा नहीं करुंगी, जैसा कहोगे वैसा करुंगी फिर उन्होंने बात करनी शुरू कर दी। मैंने इसके बाद मन ही मन सोच लिया कि कभी झगड़ा नहीं करुंगी, खुशी-खुशी जीना है और जब घरवाले शादी के लिए दबाव डालेंगे तो मैं जानबूझकर हादसे में जान दे दूंगी ताकि ना वो खुद को दोष दें ना ही समाज या पुलिस उंगली उठा पाए कि उनकी वजह से हम मरे हैं।
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एक दिन मैंने यह बात उनसे कह दी तो वह बहुत रोने लगे। मैं उनको अपनी जान से ज्यादा चाहने लगी हूं। हम दोनों के कास्ट अलग हैं। वो ब्राह्मण हैं और मैं ओबीसी। उनके घरवाले कभी नहीं मानेंगे। हम दोनों की फैमिली इंटरकास्ट शादी के खिलाफ हैं और हम दोनों भागकर शादी करना नहीं चाहते। उनके घर में सिर्फ मां हैं। उनकी मां हमारी शादी के खिलाफ हैं। एक पल के लिए मैं तैयार भी हो जाऊं तो वो अपनी मां की वजह से शादी से कतराते हैं।

उनकी मां को कुछ दिन पहले हम दोनों के बारे में पता चल गया तो दोनों में मुझे लेकर काफी तनाव हो गया। मां ने उनको खाना देना बंद कर दिया। अब वो बाहर ही खाते हैं। अपने ही घर में किराएदार की तरह रह रहे हैं। अब अगर उनकी शादी कहीं और हुई तो मैं यह देख नहीं पाऊंगी और न ही मैं खुद किसी से शादी कर पाऊंगी।
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मैं उनके बिना रह नहीं पाती। अभी भी हम दोनों मिलते हैं, साथ घूमते हैं, मैं उनके लिए ऑफिस खाना ले जाती हूं। कभी-कभी सोचती हूं कि ये सब खत्म कर दूं लेकिन मुझसे हो नहीं पा रहा। मैं उनको शादी के लिए मना नहीं पा रही।
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मुझे नहीं पता कि मेरी स्टोरी का क्या अन्त है? पर इतना पता है कि जब तक ये सांसे चल रही है, मैं सिर्फ उनकी ही रहूंगी और हर जगह साथ हूं- ऑफिस में भी और ज़िंदगी में भी। भले ही कितनी ही परेशानी आये, साथ नहीँ छोड़ूंगी उनका। दोस्तों दुआ कीजिये कि मेरा साथ उनसे कभी न छूटे। साथ छूटा तो मैं जी नहीं पाऊँगी। ये बचपने का प्यार नहीं है…समझदारी की उम्र में प्यार हुआ है जो कभी मर नहीं सकता।
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