shagufta real love story

उन्होंने बिना वजह बताए अचानक रिश्ता तोड़ लिया – शगुफ्ता की लव स्टोरी

मेरा नाम शगुफ्ता है और मैं बिहार से हूं। मैं दो बहन और मेरा एक प्यारा सा भाई है। बहुत छोटी और प्यारी फैमिली है मेरी। इन सबके बाद भी मैं अंदर से बहुत तकलीफ में हूं और वजह कोई और नहीं है, सिर्फ मैं हूं। बहनों में मैं छोटी हूं। मैं अपनी बड़ी बहन से अपनी बात शुरू करती हूं क्योंकि मेरी जो आज कंडीशन है, उनका इससे संबंध है।

हम दोनों बहनें एक ही क्लास में हैं। जब मैं और दीदी 12वीं में थी तो उस टाइम दीदी के लिए एक रिश्ता आया। लड़के वाले अच्छी फैमिली से थे और बिहेव भी अच्छा था इसलिए उनकी शादी उस घर में तय हो गई। मेरे जीजा जी तीन भाइयों में मझले हैं। जीजा के बड़े भाई की शादी हो चुकी है और छोटे भाई कोटा में उस टाइम जॉब करते थे और उनकी शादी नहीं हुई है।

जब दीदी की शादी की बात तय हो गई तो जीजा जी के छोटे भाई से मेरी शादी कराने की बात भी उठने लगी। जीजा के परिवार के कुछ लोगों ने यह बात मेरे पापा से कही। हलांकि उस टाइम तक मेरी फैमिली में किसी ने जीजा के भाई को देखा नहीं था लेकिन वो फैमिली इतनी अच्छी थी कि पापा का भी पूरा मन कर गया कि मेरी स्टडी खत्म होने के बाद मेरी भी शादी उसी घर में कर देंगे।
shagufta real love story
खैर मुझे उस टाइम तक नहीं पता था कि वो कैसे दिखते हैं, या कैसे होंगे लेकिन घर पे दीदी उनका नाम लेकर मुझे चिढ़ाती थी तो मैं शरमा जाती थी। पता नहीं उनको इस बारे में पता था कि नहीं कि उनकी और मेरी फैमिली हम दोनों के बारे में क्या सोचती थी। मेरी दीदी जब मुझे चिढ़ाती थी तो बहुत अजीब फील होता था इसलिए मैं वहां रुकती नहीं थी, भाग जाती थी।

एक दूसरे से अनजान होकर मैं और वो अपनी लाइफ जी रहे थे। मेरी दीदी की शादी हो गई। ऐसे ही टाइम बीत रहा था कि रमजान का महीना शुरू हो गया और वो रमजान के मौके पर घर आए हुए थे। रोजे का इफ्तार लेकर वो पहली बार घर आए तो उस दिन धूप बहुत तेज थी इसलिए इत्तफाक से उस दिन लाइट चली गई और गरमी बहुत ज्यादा थी। उनको बहुत पसीना आ रहा था। मेरे पापा ने मुझे बुलाया और पंखा झलने को कहा।

मैंने उनको पहली बार देखा और पंखा झलने लगी। कुछ देर बाद पापा ने मुझे बताया कि यही रहमान हैं। मेरे दिमाग में बस यही चल रहा था कि अच्छा ये वही हैं जिनसे मेरी रिश्ते की बात चल रही है। वैसे तो वो भी मुझे देख रहे थे लेकिन जब मैंने देखा तो अंकम्फर्टेंबल फील करने लगे। कुछ देर बाद वो चले गए।

मेरी उनसे दूसरी मुलाकात ईद के रोज हुई जब वो अपने बड़े भाई के साथ आए थे। इसके बाद वो कुछ दिन पर मेरी दीदी यानी अपनी भाभी से मिलने आते थे, पापा मम्मी से वो बहुत बातें करते थे। वो जब आते तो पहले सबका हाल-चाल पूछते, फिर आखिर में मेरे बारे में पूछते थे। फिर वो रोज किसी न किसी बहाने घर आने लगे।

वो दीदी से मेरे बारे में पूछते थे तो दीदी ने उनसे पूछ लिया कि ऐसा क्या हो गया जो इतनी फिक्र हो रही है तो उन्होंने भी आखिर में एक्सेप्ट कर लिया कि वो मुझे पसंद करने लगे हैं। दीदी यह बात सुनकर बहुत खुश हुई। दीदी मुझसे उनके बारे में पूछती रहती थी कि वो मुझे कैसे लगते हैं? मैं इन सवालों को इग्नोर कर देती थी।

एक दिन दीदी के कहने पर उनको मैसेज किया। मैसेज में दुआ सलाम हुआ क्योंकि मैं ब्वॉयज से ज्यादा बात नहीं करती थी। दीदी ने एक दिन मुझसे कहा कि वो तुमसे प्यार करते हैं और इनसान को उसी से प्यार करना चाहिए, जो उसको चाहे न कि उसे जिसको तुम चाहो क्योंकि जो हमें चाहेगा वो हमें कभी तकलीफ नहीं देगा और न होने देगा।

ये जानने के बाद कि वो मुझसे प्यार करते हैं, मैं उनके बारे में सोचने लगी। इसके बाद हम दोनों की बातें शुरू हुईं। उन्होंने 6 अप्रैल 2016 में प्यार का इजहार किया तो मैं बहुत खुश हुई थी। इस प्यार के इजहार के बाद सिर्फ तीन दिन हम लोग बात कर पाए। सिर्फ तीन दिन का हमारा प्यार था, आज सोचकर बहुत तकलीफ होती है। 9 अप्रैल को उनका केरल में एग्जाम था और उनकी तबियत बहुत खराब थी। वो गए और मुझे उनकी बहुत ज्यादा फिक्र हो रही थी।

मैं थोड़ी थोड़ी देर पर कॉल करके उनका हाल पूछ रही थी कि अल्लाह जाने उनको क्या हो गया। वो मेरा कॉल रिसीव नहीं कर रहे थे तो मुझे टेंशन हो रही थी कि कहीं कुछ हो तो नहीं गया। उन्होंने फोन ऑफ कर लिया। मैं उस दिन बहुत रोई, उनके इस बिहेव से। सिर्फ यही सोच रही थी कि हाल चाल पूछकर क्या मैंने गलती कर दी?

जब वो एग्जाम देकर घर आए तो मैंने उनको कॉल और मैसेज किया लेकिन उधर से कोई रिस्पॉन्स नहीं मिला। मैंने कई बार कॉल किया, उन्होंने काट दिया। मेरा दिल बैठता जा रहा था, फिर भी खुद को समझा रही थी, फिर उन्होंने एक कॉल रिसीव किया और अचानक बोले कि अब कॉल मत करना और न ही मैसेज करना, हमारा अलग रहना ही बेहतर है।

मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई, बस यही मैंने सोची कि ये मेरा वो रहमान नहीं है जो मुझसे प्यार करते थे। मैंने उनसे फोन पर कहा कि आप मजाक कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि नहीं हम सच कह रहे हैं। मैंने पूछा कि क्यों, ऐसी क्या गलती हो गई तो उन्होंने कहा कि हम दोनों एक साथ नहीं रह सकते। मैं बहुत रोई लेकिन वो कुछ नहीं बोले।

इसके बाद मैं पागल सी हो गई उनकी बात को सुनकर। आज भी इस कहानी को लिखते समय मैं रो रही हूं, न जाने क्यों। मैं जब दीदी को ससुराल से लाने के लिए गई थी तब भी उनके सामने रोई थी लेकिन उनको कोई फर्क नहीं पड़ा। मैंने बहुत बार कारण जानने की कोशिश की। मैंने पूछा कि चलो साथ नहीं रहेंगे लेकिन वजह तो बता दो, कोई रीजन तो होगा लेकिन उन्होंने नहीं बताया।

हर रोज मैं यही सोचती हूं कि आखिर मुझसे क्या गलती हो गई थी? क्या मेरी गलती ये थी कि मैंने उनकी फिक्र की, आज तक नहीं जान पाई मैं। सोचते सोचते मैं खुद ही गलत मानने लगी, मैं खुद ही बुरी थी, खराब थी, अपनी ही गलती निकालने लगी। वो मेरे फैमिली मेंबर हैं इसलिए सामने आते रहते हैं तो दिल करता है कि कॉलर पकड़कर पूछूं कि बताओ क्या गलती हुई मुझसे?

कई महीनों से उसे वजह पूछती रही, बहुत गिड़िगड़ाई लेकिन उसने नहीं बताया। मेरा नंबर उन्होंने ब्लॉक कर दिया। मेरी दीदी शायद गलत कहती थी कि जो तुमसे प्यार करे उससे प्यार करो क्योंकि वो तुमको तकलीफ में नहीं देख सकता। मैं वो करके फंस गई। वो मुझे तकलीफ में देखता भी है और तकलीफ देता भी है। क्या यही प्यार होता है?

दुख तो इस बात का है कि कोई नहीं जो मुझे ये बताए कि मेरी क्या गलती है? उस दिन के बाद मेरी सांसें चल रही हैं लेकिन मैं पहले वाली शगुफ्ता नहीं रही, न हंसती हूं, न किसी से बोलती हूं, बस अपने रूम में रहती हूं, अकेली बैठी सोचती रहती हूं, रोती रहती हूं, मुझे रात में नींद भी नहीं आती।

लोगों को हमसे शिकायत रहती है कि मैं चुप रहती हूं, बाहर नहीं जाती, हंसती नहीं, मैं क्या बोलूं कि क्या प्रॉब्लम है मुझे? मेरी बहन ने भी मेरे मामले में कुछ नहीं किया। एक साल से एक सवाल को लेकर घुट घुट कर जी रही हूं, ना किसी से कुछ कह सकती हूं, ना इस दर्द को सह पा रही हूं। रोज उनकी याद आती है और रोज रोती हूं। मैं उनको देखना नहीं चाहती लेकिन वो मेरी दीदी के देवर हैं इसलिए न चाहते हुए भी वो दिखते रहते हैं।

मेरे अंदर अब इस सिचुएशन का सामना करने की हिम्मत नहीं बची है। मैं आज भी ये बातें लिखते हुए रो रही हूं। खुद पर शर्म आती है कि क्यों उनके प्यार को एक्सेप्ट किया। खुद से घिन आने लगी है मुझे। मैं अपनी तकलीफ घर वालों को नहीं बता सकती। बस इस दर्द को लेकर घुट रही हूं। काश वो इजहार ही नहीं करते।

दिल करता है कि किसी के कंधे पर सिर रखकर अपना सारा दर्द खत्म कर लूं लेकिन ये पॉसिबल नहीं होगा क्योंकि वो जब सामने आते हैं तो फिर सारे जख्म ताजे हो जाते हैं। मुझे किसी से कुछ नहीं चाहिए फ्रेंड्स, मैं अपनी बात इसलिए आज आप लोगों से के सामने रख रही हूं क्योंकि मैं जिस तकलीफ में हूं, बस आप लोगों से शेयर करके अपने अंदर को दर्द को कम करना चाहती हूं।

Advertisements

Leave a Reply