शायरी – मैं मुंतजिर था कि कब मेहताब आएगी

मैं मुंतजिर था कि कब मेहताब आएगी

मगर उफ़क की खला में काली उदासी थी

और कुछ सितारे थे बिखरे तन्हा-तन्हा

मैं मुंतजिर था कि कब मेहताब आएगी

(मुंतजिर- इंतजार में, उफक- क्षितिज, horizon)

 

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