एक प्रेमिका के प्रेम पत्र -1 – पहला खत

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प्रिय, मेरी तरफ से तुम्हारे लिए यह पहला खत है। मगर फिर भी मैं इसे पहला नहीं कहूंगी क्योंकि इससे पहले लिखे सारे खत मुहब्बत की जमीं में आज भी दफन हैं जिसके सारे लफ्ज मेरे दिल की हालत को बयां करते हैं।

वे खत इतने सारे हैं कि मेरी याद्दाश्त उनकी गिनती भूल गई है।

मैं तुम्हारे सामने अपना गुनाह स्वीकार करना चाहती हूं। मैंने पहले भी तुमसे ये बात कही थी लेकिन उस वक्त तुम हंस पड़े थे। मेरे इश्क के इजहार की गहराई को तुम महसूस नहीं कर सके थे।

जब तुम मेरे इश्क में पड़े, मैं उससे कहीं पहले से तुमसे मुहब्बत करती रही हूं- लेकिन तुमने हमेशा मेरे अहसासों को नजरअंदाज किया।

तुम इस बात से भी इंकार करते रहे हो कि तुम मुझसे इश्क करते हो लेकिन मैं बखूबी जानती हूं कि पहली बार तुमने मुझे कब प्यार की नजर से देखा। यह सब अचानक हुआ था एक दिन जब तुम मेरे अंदर कोई बात देखकर हैरान हो उठे थे।

सिवाय प्यार की राह के किसी और रास्ते पर ऐसी हैरान कर देने वाली बातें होती हैं क्या? इन्हीं हैरानियों में प्यार छुपकर आया। मुझे तुम इससे पहले नहीं जानते थे।

पहले तुम्हारे अंदर बिखरे-बिखरे से खयालात होंगे जो एक मर्द के दिल में औरत के लिए होते हैं लेकिन प्यार उन सबको एक साथ बांधता है।

मैंने उस दिन भी पत्र लिखा था। मैंने कहा था, ‘तुम मुझसे प्यार करते हो।’

मैं उस दिन से पहले यह बात नहीं कह सकती थी जबकि मैं बारह खतों में तुम्हारे लिए अपनी मुहब्बत का बयां लिख चुकी थी।

अब मैंने तुम्हारे सामने अपने गुनाह को कुबूल कर लिया है। मुझे लगा कि शर्मों-हया के मारे में मैं लाल हो जाऊँगी लेकिन मेरा चेहरा शांत है। तुम्हारे चुंबन के अहसासों से सारी शर्मो-हया कहीं दूर चली गई हैं।

क्या तुम अपनी नज़र से अब मुझे कभी गिराओगे या हमेशा उठाओगे क्योंकि हम दोनों ही एक-दूसरे के बारे में सोचते हैं?

ऐसा लगता है कि तुमने मेरे अंदर की एक चीज़ को छीन लिया है। मैं बेशर्म सी हो गई हूँ। क्या फिर भी तुम मुझसे प्यार करोगे?

ओह! तुम मुझसे प्यार करते हो, हां करते हो। तुम आशिक हो! हम दोनों ही आशिक हैं। तुम और मैं।

अच्छा, तुमको यह जानने के बाद खुशी हुई होगी कि मैंने तुम्हारा इंतजार किया और इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, तुमसे प्यार का इजहार किया। लेकिन जब सब कुछ ठीक था तो मैं क्यूं तुमको इंतजार करती देखती रही कि तुम अपने प्यार का इज़हार करोगे।

ओह! मैं तुमको आजमा रही थी। क्यों नहीं मैंने तुमको तभी अचानक अपनी बाहों में भरा और कहा, ‘ऐ मेरे बेजुबां आशिक, देखो इधर और बताओ कि तुम किस प्यास से मरे जा रहे हो।’

और तुम कभी नहीं जान सकोगे? मेरे महबूब, कि मैंने तुम्हें किसलिए प्यार किया, तुम कभी नहीं जान सकोगे। मैं ऐसे मर्द पे यकीं करती हूँ जो यह सोचता है कि उसने शहर को जीत लिया है लेकिन उसे यह कभी पता नहीं चल पाता कि उस शहर के लिए यह बहुत थका देने वाली हार थी।

वह शहर तो खुद हारना चाहता था जिसके हर दीवार और खिड़कियों पर लगे समर्पण के झंडे लहरा-लहरा कर फट गए थे।

मुहब्बत के जंग में रणनीतियाँ तो औरत ही बनाती है लेकिन आखिर में इस मुठभेड़ में उसे हारना ही होता है जब वह किसी हसीं मर्द को सामने पाती है।

बीते दिनों जो कुछ भी हुआ, उसके लिए तुम मुझे अपनी तारीफ करने का थोड़ा मौका दो क्योंकि शायद आगे मैं अपने बारे कुछ न कह-सुन सकूं। तुम अभी इसी वक्त उन बातों के लिए मेरी तारीफ करो।

मेरे लिए तो अब कोई जंग जीतने को बाकी नहीं रहा। तुम और सुकून ने मुझे अपना कैदी बना लिया है, मुझे अपनी जिंदगी से जुदा कर दिया है।

मेरे आशिक, मैं हजार जिंदगियों में भी शायद ऐसी जिंदगी नहीं पा सकती। मैं अपना अस्तित्व मिटा देना चाहती हूँ और तुम्हारी बाहों में समा जाना चाहती हूँ। तुमको प्यार देकर मैं कितनी आसानी से तुमको अपनी जिंदगी दे सकती हूँ।

आह! मेरे प्रिय, मैं पूरी तरह से तुम्हारी, खुशी-खुशी तुम्हारी हूं। क्या तुम कभी इस बात का पता लगा पाते- तुम, जो एक चीज तलाशने में कितना वक़्त गंवा देते हो?

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26 thoughts on “एक प्रेमिका के प्रेम पत्र -1 – पहला खत”

  1. प्यार हो तो ऐसा लेकिन सबके किस्मत में सच्चा प्यार नाजी न हिट है

  2. ऐसा प्यार नसीब वालो को मिलता है।

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