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शायरी – दिल झूमता है मंजर सौ बार देखकर

सावन के मौसम में जब झूम के बारिश आती है तो हर किसी का मन यही करता है कि इस बारिश में तन-मन को भिगो लें। ऐसी ही बारिश को देखकर निकल पड़ा। सावन की बारिश की बूंदें जैसे राग मल्हार छेड़ रही थी।

बारिश का पानी कच्चे रास्तों पर जब बहने लगता है तो उसके साथ मिट्टी भी हो लेती है। ऐसा लगता है जैसे मिट्टी को भी उसका आशिक मिल गया और वो उसके साथ चल पड़ी। जाने कुदरत का ये कैसा मधुर संगीत है, जो कानों में जाकर बहुत सुख का अहसास देता है। जाने वो कौन सा फनकार जो ऐसी संगीत पैदा करता है।

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हर सिलसिला रूका रहे, हर जलजला थमा रहे
ठहरी-अंधेरी रात में खामोशी की झनकार हो

बारिश की बूंदों में सिर्फ मन ही नहीं, पूरी वादी नाचने लगती है। पत्ते हिल-हिलकर यह बताते हैं कि उनकी जिंदगी में कितनी खुशी आ गई है। भीगी-भीगी वादियों में बारिश की खूशबू फैल जाती है और सावन की यह मौसम दिल चुरा ले जाता है।

बारिश के  इसी तराने और मन के अहसास पर मैंने यह गजल 2006 में लिखी थी। उस समय बनारस में रहता था और गंगा किनारे के कई रास्ते तब कच्चे थे। वहां गंगा में बारिश की बूंदों के गिरते देखने का ऐसा आनंद था मानो लगता था कि मन ही नदी बन बन गई हो और पानी की हर बूंद से उसमें थिरकन पैदा हो रही हो। उन्हीं पलों को इस गजल में कैद किया है। बनारस की बारिश की भीगी-भीगी यादें अभी भी किसी भी मौसम में मन में सावन की घटा ले आती है।

निकल पड़े हैं मौसम ख़ुशगवार देखकर
सावन की बारिश का मल्हार देखकर

बस्ती में बह रही है राहों पे दरिया
मिट्टी भी संग चले हैं दिलदार देखकर

कानों में गूँजती है बूँदों की झनकार
हैराँ हूँ मैं कुदरत का फनकार देखकर

नाचती है भीग के हरी-भरी वादी
दिल झूमता है मंजर सौ बार देखकर

©राजीव सिंह

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