aastha love message

उत्तराखंड की बेटी ने अपनों के नाम लिखी दर्द भरी चिट्ठी, दिल खोलकर रख दिया

कितनी अजीब सी बातें हैं जो कभी-कभी कह नहीं सकते। वो इंसान को खुद लिखने पर मजबूर कर देती हैं। मै नहीं जानती कि लड़की में कहां से इतनी हिम्मत होती है, जो हर बार अपमानित होकर भी जी लेती है। वो अपनी खुशियां छोड़ इस उम्मीद में रिश्ते निभाती है कि सब ठीक हो जाएगा पर नहीं। वक़्त के साथ कुछ जख्म और गहरे हो जाते हैं। कुछ पूरी ज़िन्दगी उम्मीदों में जी जाती हैं तो कुछ कहानी खत्म कर लेती है। अजीब लगता है ना…जब हम किसी को पूरी सच्चाई बता कर ईमानदारी से रिश्ता जोड़ते हैं और वो ही हमे कुछ वक़्त बाद वेश्या करार दे देता है। ईमानदारी में दाग क्या होता है, वो बेमान क्या जाने? बस ऐसे ही चरित्र पर दाग क्या होता है, वो लगाने वाला क्या जाने?

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हम जिन अपनों के मान-सम्मान के लिये अपनी खुशियां छोड़ते हैं, वही कह देते हैं कि ये है ही ऐसी और हमें मार खाने, गालियां सुनने और निभाने के लिए मजबूर कर देते हैं। कुछ उसे किस्मत मानकर जी जाती है तो कुछ अपमानित होकर खुद को मिटा देती है पर अपनों की नजर में हर हाल में अक्सर लड़कियां ही गलत होती हैं।

प्यार करना कहां गलत होता है। परिवार की मर्जी से शादी करते हैं, तब भी वो यही कहते हैं कि ससुराल ही घर है, पति तेरा अपना है, भले मारे-पीटे, गालियां दे, जो है वो तेरा पति है। परिवार हमारी पसन्द को इसलिए ना कह देता है क्योंकि कास्ट, इज्जत आ जाती है बीच में, पर जब हम बीमार होते हैं तब हमें दवा देने से पहले नहीं सोचते कि लोग क्या कहेंगे? जब स्कूल में भेजते हैं, पढ़ाते हैं, तब नहीं सोचते कि लोग क्या कहेंगे पर जब बच्चों की ख़ुशी शादी की बात आती है तो लोग क्या कहेंगे, यही सोचते हैं। वो 4 लोग तो अंत में वही होते हैं जो राम नाम सत्य है, कहते हैं।

मै उस प्यार को बढ़ावा नहीं देती जहाँ जिस्म ताल्लुक रखता है और बिस्तर में आकर मुकम्मल हो जाता है। प्यार सच्चा और ईमानदार भी होता है। जो एक-दूसरे की इज्जत करते हैं, सपनों का मान करते हैं, जिस्म नहीं, रूह से प्यार करते हैं और अपनी ईमानदारी के रिश्ते को नाम देने के लिए बात करते हैं जब घर में, तब भी बस गालियां ही सुनते हैं, चरित्रहीन हो जाते हैं। क्यों परिवार एक बार ये नहीं सोचता कि बस एक बार तो उससे मिल लेते हैं, देख लेते हैं ताकि बच्चों को भी लगे कि हां परिवार साथ है पर नहीं वो तो हमारा स्वागत गालियों-तानों से करते हैं।

हाँ माँ-बाप की उम्मीदें तोड़ते हैं। हम उनके सपने तोड़ते हैं पर वो हमारे अपने हैं, हम भी किससे कहें कि और कोई नहीं, हमारी खुशी वो है, हम कैसे मर-मर कर कहीं और रिश्ते निभा लें और अंत में बस वही होता है, जो जिस्मों से मोहब्बत करते हैं, वो जी जाते हैं नए जिस्म की तलाश में, पर जिनके प्यार मे सच्चाई होती है, वो समझौते कर जी लेते हैं या खत्म कर लेते हैं खुद को।

समझौता कर जीना आसान नहीं होता। पूरी ईमानदारी से निभाकर भी, वो भरोसा कभी नहीं मिलता। हमारे माँ-बाप सोचते हैं कि हम खुश हैं पर उनको क्या पता जिसे उन्होंने पसन्द किया वो रोज पीता है, मारता है, गालियां देता है। रोज उनकी बेटी अपमानित होती है, ये वही बेटी होती है जो कभी डॉक्टर टीचर बनने के सपने देखती है और आज गालियां खाती है, यह भी कम नहीं होता तो माँ बाप भी कह देते हैं- ये तो थी ही ऐसी।

तब बस वही प्यार याद आता है और लगता है कि काश उसे चुना होता तो आज डॉक्टर या टीचर बनने की राह में होती। मेरी पवित्रता ईमानदारी की कदर होती, अब इन रिश्तों का क्या जिसने बस मान सम्मान का जरिया समझा मुझे और आज ‘थी ही ऐसी’ कह कर वास्ता खत्म कर लिया। वो कहते हैं कि तू अब किसी और की अमानत है और पति कहता है जा अपने घर और लडकियां समझ ही नहीं पाती कि उनका घर कौन सा है और उसके अपने कौन हैं?

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