मां-बाप हम बेटियों को किस्मत के सहारे क्यों छोड़ते हैं – उत्तराखंड की बेटी का दर्द

कहते हैं कि परिवार हमारे संस्कारों की, मान-मर्यादाओं की और भविष्य के संस्कारो की पहचान होती है। परिवार से हमें मान-सम्मान करना, प्यार करना सब सिखाया जाता है। बचपन में जब कुछ सवालों के जवाब नहीं मिलते थे तो मासूमियत लिए मां पापा के पास जाया करते थे और पूछा करते थे कि हम कहां से आए? भगवान जी ने हमें कहां दिया और हम आपको कहां मिले?

यह सब हमारी वह मासूमियत भरे सवाल थे जिनके जवाब हमें अक्सर मिल जाया करते थे। वक्त बदलता रहा, बच्चे बड़े होते हैं और मां-बाप से दूर भी। अब वह हमारे सवालों के जवाब देना तो दूर, मां-बाप तो अब हमारे सवाल ही पसंद नहीं करते हैं। बात करूं अपने पहाड़ों के जीवन की तो यहां का जीवन जानवर, खेतों और अपना काम- यहां से शुरू और यहीं खत्म हो जाता है। लोगों के पास इतना वक्त नहीं होता कि बच्चों के पास बैठकर दो मिनट उनकी जिंदगी में चल क्या रहा है, यह जान सकें। उनके लिए तो बस बच्चे पढ़ रहे हैं और हर साल एक क्लास आगे बढ़ते रहें, यही है उनके लिए पढ़ाई के मायने, बाकी अपने बच्चों की जिंदगी में जो कुछ भी होता है उससे कोई मतलब नहीं होता।

मां-बाप का वह प्यार और वह सवालों के जवाब देना बस कभी-कभी होता है तब जाकर बच्चों की कहीं अलग ही दुनिया हो जाती है। उनको कोई उन सा मिल जाता है, कुछ को कोई सच्चा तो कुछ को झूठा। हमारी जिंदगी में कितना कुछ हो जाता है और मां-बाप को भी हम सब नहीं कह पाते। रोने के लिए हम रात का इंतजार करते हैं। अजीब है ना यह।

यह वही मां बाप होते हैं जिनसे बचपन में हम अपने सारे सवालों के जवाब पा लेते थे। आज अपने दर्द और तकलीफ को उनसे कह तक नहीं पाते हैं। लड़कियां बड़ी होती हैं तो शादी की फिक्र है और सबसे बड़ी बात, एक सोच कि लड़का नहीं- लड़के के पापा सरकारी कर्मचारी हैं, लड़के का भाई फौज में है, अपना मकान है तो लड़की खा लेगी। बाकी उसकी किस्मत, कोई उससे यह नहीं पूछता कि जिस इंसान से उसकी शादी हो रही है वह तो कुछ काम करता ही नहीं है तो वह कैसे खा लेगी? रोज शराब पीता है, गाली देता है, फिर भी खा लेगी, वो भी बस इसलिए कि परिवार अच्छा है, पैसे वाला है और बस उस चमक में एक जिंदगी बर्बाद हो जाती है। लड़कियों को पैसे की नहीं मान-सम्मान और प्यार की जरूरत होती है। इतना कुछ होने तक हम 20 से 21 साल के होते हैं और कितने रंग देख लेते हैं जिंदगी के।

अपने रिश्तो में सोच का अंतर, झूठे मान-सम्मान की फिक्र और न जाने क्या-क्या….वक्त के साथ मुश्किल हो जाता है मां बाप का बच्चों के बारे में सब जान पाना। यह बात सच है क्योंकि बच्चे भी दूर हो जाते हैं। बच्चों को भी तो मां-पापा के वक्त की जरूरत होती है। एक तरह से देखा जाए तो मां-बाप जहां बच्चों के दोस्त होते हैं, पास होते हैं, वहां बच्चों को इनसे कुछ छुपाने की जरूरत ही नहीं होती है। अक्सर देखने को मिलता है मां घर के कामों में और पापा अपने काम में…उनका वो रात को आना और किसी-किसी घर में लड़ाइयां, गालियां, मारपीट और बच्चों का अंदर से सहम जाना। वह सहमा सा बच्चा कुछ सहारा ढूंढता है, रोना चाहता है खुलकर….और वही सहारा कोई दोस्त बनकर हमारी जिंदगी में आता है।

दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल जाती है और यह सब पता ही नहीं चलता है, जो सच्चा होता है वह हमसफ़र बनने की राह चुनता है और जो झूठा होता है वह हमें एक सबक दे जाता है पर बीच में आ जाती है, समाज, परिवार, इज्जत, कास्ट और जो मां-पापा रोज आपस में लड़ा करते थे, वह साथ होकर इज्जत की दुहाई देते हैं। पता नहीं क्यों? क्या मारपीट, गाली-गलौज में इज्जत नहीं जाती, वह शान का काम होता है? फिर बच्चे थक हार कर रोकर बस अपने जीवन को अपने परिवार के नाम कर देते हैं और वह करने को मजबूर हो जाते हैं जो परिवार कहता है। पता नहीं यह कौन सी सोच है कि शादी हो जाए, बच्चे हो जाएंगे तो सब ठीक हो जाएगा। अरे कैसे होगा, जवाब तो दो कोई। वो मजबूरियां होती हैं, जिंदगी की खुशियां नहीं।

फिर मां-बाप बेटियों को किस्मत की बात कहते हैं तो हमें वहां क्यों नहीं भेजते जहां मर्जी से अपनी किस्मत बनाना चाहते हैं, क्यों रिश्ता नहीं जोड़ते वहां। कभी-कभी खुद पर जब इस सोच का प्रभाव पड़ता है ना, तो लगता है कि 21 वीं सदी में हम कितने पिछड़े हुए हैं जहां आज भी लड़कियों को बस सामान समझा जाता है। जिनकी कोई ख्वाहिश नहीं होती, पढ़ना चाहती है तो कहते हैं, क्या करेगी पढ़कर…जिसे वह अपने लिए पसंद करती है, अपने सपने कहती है और जहां पर बांधी जाती है, वहां वह सपने ही खत्म हो जाते हैं। नहीं पता कब लोग वाकई में लड़कियों को समझेंगे कि उनकी भी इच्छा होती है, हर चीज किस्मत पर नहीं छोड़ी जाती। किस्मत का हर लम्हा खुद लिखा जाता है।

कोशिश कर हम खुद कुछ पा लेते हैं और नाम आता है किस्मत का, कोशिश हमारी, मेहनत हमारी और नाम किस्मत का। कोई यह नहीं सोचता हम नाकामयाब हुए तो कमी कहां रह गई और कामयाब हुए तो उसमें हमारी कितनी मेहनत थी। किस्मत का हर लम्हा हम लिखते हैं फिर भी अजीब बात है ना किस्मत…यह नाम कितनी जिंदगियां बर्बाद कर जाता है और किसी को खबर तक नहीं होती।

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