neha real story

हमने उसको अपनी औलाद की तरह प्यार किया लेकिन वह धोखा दिया – नेहा की रियल लाइफ स्टोरी

मैं मध्यप्रदेश से नेहा गर्ग हूं। हमारी शादी को दस साल हो चुके थे पर आज भी हमारा आंगन बच्चे की किलकारियों से सूना था। हमने बहुत कुछ किया, डॉक्टर वैद्य नीम हकीम पंडित…पर सब बेकार, कुछ काम नहीं आया। हम इसे अपनी नियति मानकर जिंदगी में खुश रहने की कोशिश करने लगे और खुश भी रहे। हमारी एक छोटी सी किराने की दुकान है कॉलोनी में ही और मैं टीचर हूं। जिंदगी बस चल रही थी। कॉलोनी के बच्चे हमसे बहुत हिले मिले थे। कोई चाची बोलता तो कोई मौसी तो कोई आंटी। बच्चों के साथ यूं ही हंसते बात करते दिन निकल रहे थे।

लगता था कि अब यही सब हमारी जिंदगी है पर एक दिन हमारे बगल वाले घर में एक लड़का आया जिसकी उम्र 18 साल की थी। वो अपने गांव से पढ़ने के लिए आया। बाकी बच्चों की तरह ही वो भी दुकान पर आता तो उससे भी वैसे ही बात होती थी जैसे सब बच्चों से करते थे। पर पता नहीं उसमें ऐसा क्या था कि वो सबसे अलग लगा था। उसमें एक अलग ही भोलापन था, मासूमियत थी। वो खाना होटल में खाता था। कई बार हम उसे अपने साथ खाने पर बुला लेते थे।
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पता ही नहीं चला कि कब वो हमारे दिल में अंदर तक उतर गया और वो हमें और हम उसे अपना मानने लगे। एक दिन अचानक उसने मुझे मम्मी बोल दिया। मेरे पास शब्द नहीं हैं उस फीलिंग को बताने के लिए कि मुझे क्या फील हुआ उस टाइम। बस तबसे वो हमारा बेटा बन गया और हम उसके मम्मी पापा। वो अब हमें मम्मी पापा ही बोलता और हम भी उसे अपना बेटा बोलकर ही सबसे मिलवाते थे।

अब तो हमारे लिए उसके बिना एक पल भी रहना मुश्किल हो गया था। उसके लिए ही अब जीते थे। मुझे तो उसके हर नखरे उठाने में मजा आता था। ऐसा लगता था कि भगवान ने मेरी झोली भर दी है। अब कोई मुराद अधूरी नहीं रही हमारे जीवन में। ऐसा लगता था कि सबकुछ मिल गया। पर शायद दुनिया को ये खुशी बर्दाश्त नहीं हुई।

कुछ लोगों ने उसके कान भरने शुरू कर दिए। अब उसे हमारी छोटी छोटी बातों में लगता था कि हम उसे टोक रहे हैं जबकि अब तक तो हम उसे अपने आप से भी ज्यादा प्यार करने लगे थे इसलिए उसे अच्छे बुरे के लिए टोक देते थे पर अब ये सब बातें हम लोगों में दूरियां लाने लगी थी। फिर एक दिन अचानक ऐसा हुआ कि उसने शहर छोड़कर जाने का फैसला ले लिया और हम कुछ नहीं कर पाए।

फिर भी एक आस थी कि वो वापस जरूर आएगा। हम पल-पल उसकी राह देखते थे। उसके फोन का इंतजार करते थे। उसके दोस्तों के जरिए उसका हाल चाल लेते थे। उसने हमसे दूरियां बनानी शुरू कर दी थी पर हम ये नहीं समझ पाए और फिर इसी दिवाली की छुट्टियों में एक बार फिर आया गांव से, पर हमारे पास नहीं आया। हम इंतजार करते रहे कि शायद अब आएगा पर नहीं…वो नहीं आया, न ही उसका फोन आया।

हमारी नजरें सिर्फ दरवाजे पर ही लगी रही। जरा सी आहट पर लगता है कि वो आ गया। कहीं से आवाज आती तो लगता है कि वो आ गया। पागलों की तरह मैंने पूरा दिन उसकी राह ताकने में निकाल दी। आज मैं अपनी इस कहानी के जरिए उससे पूछना चाहती हूं कि क्या हम किसी की भावनाओं के साथ यूं खेल सकते हैं? पहले तो तसल्ली कर ली थी कि भगवान ने ही नहीं दिया तो कोई बात नहीं पर उसने हमारे जीवन में आकर जो हमारे दिलों में ममता भर दी थी, अब उसे कैसे निकालें अपने दिल से।

मैं तो बस यहीं कहूंगी कि यदि हम किसी के साथ रिश्ते ना निभा पाएं तो बनाए ही नहीं क्योंकि पूरे से आधे का दुख ज्यादा होता है।

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