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बच्चों को अपनी जिंदगी का फैसला लेने दें मां-बाप तो उनकी जिंदगी बेहतर होगी…

कई लोग मेरी इस बात को लेकर आलोचना करते हैं कि मैं अपनी जिंदगी का फैसला लेने के लिए मां-बाप या किसी पर भी निर्भर नहीं होने की बात करता हूं। आलोचना करने वाले लोग मां-बाप की इच्छा के अनुसार चलने के समर्थक हैं और उनके खिलाफ कोई भी विचार रखने वाले इंसान को ये तर्क देते हैं-

तर्क 1- मां-बाप बच्चों के जन्म देते हैं। उनको बड़ा करने के लिए पैसा कमाते हैं और बहुत मेहनत करते हैं। उनके भोजन, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा का इंतजाम करते हैं तो उनकी जिंदगी पर मां-बाप का पूरा हक बनता है। मां-बाप जो चाहें उनकी जिंदगी के बारे में तय कर सकते हैं।

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तर्क 2- मां-बाप अपने बच्चों के बारे में कभी भी बुरा नहीं सोच सकते। वो हमेशा भला ही सोचते हैं इसलिए जो वो सोच रहे हैं बस उसको मान लो क्योंकि वो तो भला ही सोच रहे हैं। इस तर्क के मुताबिक, मां-बाप जो कुछ भी करेंगे, चाहे वो कुछ भी हो, उससे बच्चे का भला ही होगा।

तर्क 3- मां-बाप बच्चों के लिए जीवन में बहुत सारा त्याग करते हैं। यह कर्ज इतना बड़ा होता है कि हम जीवन देकर भी नहीं चुका सकते। इसलिए उनके फैसलों को मानकर एक तरह से हम उनका अहसान चुकाते हैं।

तर्क 4- मां-बाप भगवानस्वरूप हैं। वो बच्चों के लिए ईश्वर हैं। मां-बाप के फैसले की अवहेलना एक तरह से ईश्वर के आदेश या इच्छा की अवहेलना है। बच्चे ऐसा करके बहुत बड़ा पाप करते हैं।

तर्क 5- नौ महीने गर्भ में पीड़ा सहकर मां ने कैसे जन्म दिया, फिर कैसे बचपन में कई रातें जागकर उन्होंने हमें बड़ा किया। उधर पिता घर का खर्चा चलाने के लिए कहीं दिन रात काम में जुटे रहे। उन्होंने हमें इस लायक बनाया कि हम सोच सकें और जब सोचने लायक बने तो उन्हीं की बात नहीं मानें ये तो गलत है। इससे बेहतर तो बच्चों को सोचने लायक ही न बनाते।

तर्क 6- बड़े हो चुके बच्चे जो मां बाप के फैसलों के खिलाफ जाते हैं, उनको तो जन्म देते ही मां-बाप जहर दे देते तो अच्छा था। ऐसे बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करने का क्या मतलब जो मां बाप की ही बात न माने।

तर्क 7- जब खुद मां-बाप बनोगे और बच्चों का पालकर बड़ा करोगे..जब वे तुम्हारी बात नहीं मानेंगे तब पता चलेगा कि मां-बाप का दर्द क्या होता है। ऐसे नहीं समझ पाओगे, इसके लिए मां-बाप बनना पड़ेगा।

तर्क 8 – जिनके मां-बाप नहीं है उनसे जाकर पूछो कि मां-बाप क्या होते हैं। मां-बाप न होने का दर्द वे बच्चे बताएंगे और जिनके मां-बाप हैं वो उनका दर्द ही नहीं समझते।

ऐसे न जाने कितने तर्क हैं? मां-बाप बच्चों के लिए बहुत कुछ करते हैं, इस बात को कौन स्वीकार नहीं करेगा…लेकिन इस वजह से आप बच्चे की जिदंगी, उसकी मानसिक ताकत, उसके अस्तित्व को कमजोर कर दो…इसके पक्ष में मैं नहीं हूं। हर इंसान को अपनी जिंदगी का फैसला लेने का हक है, चाहे उसका अंजाम कुछ भी हो। गलतियों से ही इंसान सीखता है और बेहतर बनता है। मां-बाप की सुरक्षा की छत की जरूरत बच्चों के लिए एक उम्र तक ठीक है लेकिन उसके बाद यही छत उसकी जिंदगी को बर्बाद भी करती है।

आज कई घरों में मैं देख रहा हूं कि बड़े हो रहे बच्चे किसी चीज की परवाह ही नहीं करते क्योंकि उनके मां-बाप ने उनको बचपन से आश्वस्त किया है कि बच्चे तेरी जिंदगी में किसी चीज की कमी नहीं होने देंगे। इसके बाद जब बच्चे कुछ नहीं करते तो मां-बाप हमेशा टेंशन में रहते हैं कि उनका बच्चा अपने जीवन के बारे में सोच नहीं रहा…अरे वो कैसे सोचेंगे, आपने कभी सोचने दिया ही नहीं….

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