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हीर रांझा 29 – ननद सेहती से हीर और जोगी रांझा का हुआ झगड़ा

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रांझा और हीर को एक दूसरे से बातें करते सेहती ने देख लिया। उसने देखा कि हीर बड़े प्यार से जोगी को देख रही है और उससे कुछ कह रही है। हीर को इस तरह जोगी के जादू में आते देख सेहती को गुस्सा आया। वह जोगी पर बरसते हुए हीर से बोली, ‘बहन, जोगियों पर भरोसा मत करो। ये झूठे मक्कार होते हैं। इस बदमाश जोगी पर तो हम बिल्कुल भी भरोसा नहीं कर सकते।’

रांझा ने जवाब दिया, ‘तुमको तो जोगी के पैर पकड़कर आशीर्वाद मांगना चाहिए। इसके बदले तुम लड़ रही हो।’ सेहती ने कहा, ‘ज्यादा बोलोगे तो मैं तुम्हारा मुंह तोड़ दूंगी।’

सेहती और रांझा में तू तू मैं मैं होने लगी। दोनों को झगड़ते देख हीर ने रांझा को इशारा किया कि वह झगड़ा बंद करे और सेहती से भी यही कहा। यह बात सेहती को बुरी लगी। उसने हीर से कहा, ‘हाय हाय, सैदा की दुल्हन पर तो जोगी ने प्यार का जादू कर दिया है।’ इस पर हीर भी गुस्सा हो गई। बोली, ‘सेहती, तुम सब नौजवानों से लड़ती रहती हो। इस फकीर को भी बुरा भला कह रही हो। पति के लिए बहुत तरस रही औरतें ही ऐसा करती हैं।’ इस पर सेहती बोली, ‘बहन, तुम तो इस दुष्ट का पक्ष लेकर मेरी हत्या कर रही हो। या तो यह जोगी ही तुम्हारा आशिक है या तुम्हारे आशिक की कोई खबर लाया है।’

इस पर हीर कहने लगी, ‘हां सेहती, तुम तो दूध की धुली हुई हो और मुझे बुरा ठहरा रही हो। तुम बहुत ही घटिया औरत हो।’ यह सुनते ही सेहती आपा खो बैठी। उसने एक नौकरानी से कहा, ‘इस फकीर को कुछ देकर भगा दो।’ नौकरानी ने थोड़ा सा चावल दिया और उसे जाने को कहा। अब रांझा का गुस्सा फूटा, ‘यह तुम चिड़ियों का खाना जितना चावल दे रही हो। तुमने फकीर का अपमान किया है। अब तुमको इसका दंड झेलना होगा।’ इस पर सेहती आई और फकीर के कटोरे में उसने कुछ और सामान फेंका। कटोरा फकीर के हाथ से छूटकर गिरा और टूट गया।

जोगी चिल्लाने लगा, ‘तुम्हारे सर पर कयामत आए। तुमने फकीर का कटोरा तोड़ दिया। तुम्हें कोई प्यार करने वाला न रहे। यह कटोरा मुझे मेरे पीर ने दिया था। तुम क्या जानो इसकी कीमत मेरे लिए क्या है। तुमको खुदा का खौफ नहीं है।?’ जोगी कटोरे का टुकड़ा बटोर रहा था। सेहती ने उसे कहा कि कटोरा उसने नहीं तोड़ा। वह तो दुर्भाग्य से टूट गया। ‘तुम जाओ, कुम्हार से नया कटोरा बनवा लेना। दुर्भाग्य से कोई बच नहीं सकता। आदम हव्वा नहीं बच पाए और जन्नत ने निकाले गए तो जोगी तुम किस खेत की मूली हो?’

हीर ने सेहती से कहा, ‘यह क्या तरीका है किसी से बात करने का। क्यों इस फकीर से लड़ रही हो जो बस भोजन के सहारे जिंदा रहता है। क्यों तुमने उसका कटोरा तोड़ दिया और मेरे दरवाजे पर उसको अपमानित कर रही हो। क्यों इस घर की खुशी में तुम और आग लगा रही हो जबकि तुम जानती हो कि मेरा दिल किसी के प्रेम की आग में ऐसे ही जल रहा है।’

अब सेहती हीर पर टूट पड़ी, ‘हां हां, सारा घर तो तुम्हारा ही है। हम कौन होते हैं इस घर में। तुम्हारे बाप ने तो इस घर को तुमको खरीदकर दिया है। बदचलन औरत, तुम शादीशुदा होकर भी मर्दों के पीछे भागती हो। अपने पति सैदा के बारे में अब तक तुम्हारे मुंह से एक बोल नहीं फूटे होंगे और इस जोगी से बहुत तुम्हारी बन रही है।’

हीर ने जवाब दिया। ‘तुमको लड़ने के लिए यह जोगी ही मिला। तुम जिंदगी में कभी किसी के साथ खुश नहीं रह सकती। जोगी से झगड़ा करने से शामत आ सकती है। अगर इसने शाप दिया तो हम बरबाद हो जाएंगे। सिकंदर भी फकीर के पैर छूते थे। जोगी से माफी मांग लो वरना वह हमारे ऊपर कयामत ला देगा।’

सेहती हीर की बातों से नहीं डरी। ‘इस जोगी ने मुझे ताना दिया, बुरा भला कहा। मैं और बरदाश्त नहीं कर सकती। अब या तो मैं जहर खा लूंगी या इस जोगी को मार डालूंगी या तुमको नहीं छोड़ूंगी। मैं तुम्हारे चाल चलन के बारे में अपने भाई सैदा और मां को सब कुछ बता दूंगी कि किस तरह तुम अब भी चरवाहे के इश्क में मरी जा रही हो।’ इसके बाद सेहती एक डंडा लेकर जोगी की तरफ लपकी और उसे पीटने लगी। उसने जोगी का सर फोड़ दिया। वहां हो रहे शोर को सुन आसपास की महिलाएं भी आ गईं और सबने मिलकर रांझा को वहां से धक्का देकर निकाल दिया।

रांझा वहां से जाते जाते खुदा से कह रहा था, ‘क्यों मुझे तुमने हीर से मिलाकर जुदा कर दिया। मैं क्या पाप किया है जो पहले तुमने जन्नत दिखाई और अब मुझे जंगल में भटकना पड़ रहा है। मैं अपने प्रेम को पाने के लिए आखिर क्या करूं।’ रांझा सेहती से बदला लेने की बात सोचता हुआ चला गया। कहानी आगे पढ़ें।

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हीर रांझा 21 – हीर रांझे की मुलाकात पर फिर मचा बवाल

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जैसे ही रांझा ने हीर का संदेशा सुना, वह उदास हो गया। नदी में नहाकर वह बांसुरी बजाते हुए पांच पीरों को खोजने लगा। जल्दी ही वे मिल गए। रांझा रोते हुए उन पीरों के सामने हाथ जोड़ते हुए बोला, ‘मेरी मदद कीजिए नहीं तो मेरा प्यार बरबाद हो जाएगा।’

पीर बोले, ‘तुम्हारा मन बहुत व्याकुल है और तुम्हारी आत्मा परेशान है। हमारे दिल में तुमसे गीत सुनने की इच्छा जाग गई है।’ रांझा गाने लगा। रांझा की मधुर तान सुनकर पीर खुश हो गए। उन्होंने कहा, ‘जो भी चाहो मांगो, तुमको मिलेगा।’

रांझा ने कहा, हीर से मुझे मिला दो। पीर बोले, ‘हम तुम्हारी मदद करेंगे। हीर तुम्हारी है लेकिन उसके साथ तुम वैसा व्यवहार मत करना जैसा अन्य मर्द अपनी औरतों के साथ करते हैं। ना तो तुम उसे छोड़ोगे, ना ही उसके मां बाप के घर से भगाओगे क्योंकि वह अनाथ या लाचार नहीं है। हीर के अलावा किसी दूसरी औरत पर नजर मत डालना।’

रांझा पीर से विदा लेकर चला। हीर और रांझा अपने प्यार को छुपाते हुए सबसे छुप छुप कर मिलने की कोशिश करने में लग गए। उन्होंने सहेली मीठी को विश्वास में लेकर उसी के घर मिलने का फैसला लिया। इसके लिए रांझे ने मीठी को पैसे दिए जिससे वह खुश हो गई और मदद को तैयार हो गई। मीठी का घर हीर के गांव के कोने पर उस तालाब के किनारे पर था जहां पशु पानी पीने आते थे। मीठी ने अपने घर में दोनों के मिलने का सारा बंदोबस्त कर दिया। हीर रात को चुपके से रांझा से मिलने आती और रात के तीसरे पहर घर लौट जाती। सुबह रांझा भैंसों को लेकर जंगल निकल जाता। चेनाब नदीं के किनारे हीर सहेलियों के साथ नहाने के बहाने आती, जहां दोनों की फिर मुलाकात होती। रांझा बांसुरी बजाता और हीर सहेलियों संग चेनाब के गीत गाती।

इन सारी बातों की खबर जब दूसरे चरवाहों को हुई तो उन्होंने जाकर हीर के शैतान चाचा कैदु के कान भर दिए। कैदु हीर की मां मिल्की के पास गया और फिर उलाहना देने लगा। ‘तुम्हारी बेटी बेटियों के नाम पर कलंक है। वह चरवाहे के साथ चेनाब नदी में खेलती है। उसने गांव को बदनाम कर दिया। हीर को अब रोकना ही होगा।’

मिल्की ने कुछ लोगों को हीर को बुलाने भेजा। उन्होंने हीर से जाकर कहा, ‘तुम्हारी मां बहुत गुस्से में है। चूचक और घर के बड़े लोग तुमसे खफा है, वो न जाने तुम्हारे साथ क्या करेंगे।’ रांझा को भी उन्होंने कहा, ‘मिल्की ने तुमको मरवाने की धमकी दी है। पूरे सियालों का गांव क्रोधित है, वे तुमको मार डालेंगे।’

हीर मां के पास आई तो मिल्की उसपर चिल्लाने लगी, ‘बेशर्म, बदचलन, वेश्या। तुम उससे जंगल में मिलकर खेल कर रही हो और गांव की गली गली में तुम्हारे करतूतों का शोर मचा हुआ है।’

हीर भी मां की बात सुन ताव में आ गई, ‘झूठ बोल रहे हैं सब। तुम भी बात को बढ़ा चढ़ाकर बोलती जा रही हो। इन सबमें क्या रखा है? हां, रांझा भी जंगल में था, मैं भी अपनी सहेलियों के साथ वहां घूम रही थी। मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है, ये सब तूफान किसलिए? हर तरफ यह चर्चा कौन फैला रहा है? मां, मैं रांझा को नहीं छोड़ सकती। अगर दादा के दादा भी आके कहें तो भी वे मुझे मजबूर नहीं कर सकते।’

बेटी की बात सुनकर मिल्की चुप हो गई। वह समझ गई कि रांझा के साथ रहने का हीर प्रण कर चुकी है और उसके दिल में अब मौत का भी भय नहीं है। यह सब देखकर कुटिल कैदु लंगड़ाते हुए गांववालों के पास पहुंचा और दुष्ट बोला, ‘तुमलोग मूर्ख हो। मेरी सलाह पर गौर क्यों नहीं करते। मेरे अलावा तुमलोगों को भलाई की बात कोई और नहीं बता सकता। हीर दिनभर जंगल में रांझे की बाहों में रहती है। अगर तुमलोगों ने इस पर कुछ नहीं किया तो एक दिन वह उसके साथ भाग जाएगी और तुमलोग सियालों की इज्जत मिट्टी में मिलते देखोगे।’ कहानी आगे पढ़ें।

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हीर रांझा -9 – हीर की गद्दी पर रांझा

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नाव पर लाकर रांझा को सबने हीर की गद्दी पर बिठा दी।

रांझा गद्दी की खूबसूरती देखकर इसके बारे में पूछने लगा तो लोगों ने बताया कि यह एक बेहद खूबसूरत लड़की इस पर बैठती है। वह मीर चूचक की बेटी है। माहताब से भी ज्यादा चमकता हुस्न है उसका। उसके हुस्न के कयामत से परियों की रानी तक खौफ खाती हैं। एक बार जो उसके जादू में गिरफ्तार हुआ, वह धरती पर आवारा हो गया। वह सियालों के लिए गर्व करने की चीज है। उसका नाम हीर है।

रांझा ने बिना किसी भेदभाव के, बड़े-छोटे, अमीर-गरीब; सबसे उस गद्दी पर बैठने की गुजारिश की। वे सब रांझा के आस-पास उसी तरह बैठ गए जैसे कि शम्मे को चारों तरफ से परवाने घेर लेते हैं।

अब लुड्डन रांझा को उस पार न ले जाने की बात को यादकर पछता कर रहा था। वह कहने लगा, ‘मुझे डर लगने लगा था कि कहीं यह डाकू बांसुरी के जादू से मेरी बीवी को लूटकर न ले जाए।’

नाव पर लोग रांझा से उसकी जिंदगी के बारे में पूछने लगे। कहां से आए हो? घर क्यों छोड़ दिया? तुम तो बड़े कमजोर दिख रहे हो, क्या किसी ने तुमको कुछ खाने-पीने को नहीं दिया?

रांझा ने सबको अपनी पूरी कहानी सुनाई और कहा, ‘मैं अपने मां-बाप का दुलारा था लेकिन खुदा को यही मंजूर था जो अब मेरे साथ हो रहा है।’

नाव के उस पार जाने के बाद लोग गांवों में रांझा का किस्सा सुनाने लगे। उसके बांसुरी के जादू के बारे में सबको बताने लगे। वे कहते,’जब वह बोलता है तो उसकी जुबां से फूल झड़ते हैं। लुड्डन की बीवियां तो उससे प्यार करने लगी और वह हीर की गद्दी पर बैठा।’  – कहानी आगे पढें

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हीर रांझा – 5 – रांझे का हुआ बुरा हाल

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बहुत दूर चलने के बाद रांझा एक मस्जिद के पास पहुँचा जो मक्का और यरूशलम के मस्जिद जैसा ही खूबसूरत था। भूख और ठंड के मारे उसका बुरा हाल था और वह बहुत थका हुआ था। उसने अपनी बाँसुरी निकाली और बजाने लगा।

उसके संगीत से आसपास जादू सा होने लगा। कुछ लोग सुनकर अपना होश खो बैठे और कुछ उसकी तरफ खिंचे चले आए। पूरा गाँव उसके आसपास जुट गया। अंत में मुल्ला आया जो झगड़ालू किस्म का था।

रांझा को देखते ही वह कहने लगा, “लंबे बालों वाला यह काफिर कौन है? यहाँ ठगों के रहने के लिए जगह नहीं है। अपने बाल पहले कटवाओ ताकि तुम ख़ुदाई जगह पर रूकने के काबिल हो सको।”

रांझा ने मुल्ला को जवाब दिया, “लंबी दाढ़ी से तो तुम शेख की तरह लगते हो फिर भी शैतान की तरह व्यवहार क्यों कर रहे हो? मेरे जैसे बेकुसूर यात्रियों और गरीब फकीरों को दूर क्यों भगाते हो? तुम कुरान अपने सामने रखते हो फिर भी तुम्हारे मन में इतना भेदभाव भरा है। तुम गाँव की महिलाओं को गलत राह दिखाते हो; तुम तो गायों के बीच में साँढ जैसे हो।”

मुल्ला ने पलटकर जवाब दिया, “मस्जिद ख़ुदा का घर है और तुम्हारे जैसे शैतान को इसमें रहने का कोई हक नहीं है। तुम नमाज अता नहीं करते, लंबे बाल और मूंछें रखते हो। ऐसे आदमी को तो हम पीट कर भगाते हैं। कुत्तों और तुम्हारे जैसे भीखमंगों को तो चाबुक से मारा जाना चाहिए।”

रांझा ने मुल्ला से कहा, “ख़ुदा तुम्हारे गुनाहों को माफ करे। ऐ अक्लमंद इंसान, ये बताओ कि शुद्ध क्या है और अशुद्ध क्या? गलत क्या है और सही क्या? नमाज किन चीजों से बनता है, यह कैसे अता किया जाता है और यह किसके लिए शुरू हुआ था?”

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हीर रांझा -4 – रांझा घर छोड़ चला

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साहिबा की बातों का जवाब देने में रांझा भी पीछे नहीं हटा। कहने लगा, “तुम्हारे जैसी भौजाई को तो नदी में डूबो देना चाहिए। मैं हीर को ब्याह कर लाऊँगा और तुम्हारे जैसी औरतें उसकी नौकरानी बनेंगी।”

और यह कहने के बाद रांझा मुँह घुमाकर बैठ गया, साहिबा उसका कांधा देखती हुई बोली, “तुमको अब जल्दी से जल्दी शादी कर ही लेनी चाहिए नहीं तो हीर की खूबसूरती मुरझा गई तो बहुत देर हो जाएगी।’

इस झगड़े के बाद रांझा अपनी बाँसुरी को लेकर पिता का घर छोड़कर जाने लगा। अब वह तख़्त हजारा का पानी तक नहीं पीना चाहता था। गाँव का एक चरवाहा दौड़ा-दौड़ा रांझा के भाइयों के पास गया और उनको इस बारे में बताया। रांझा का अपनी भाइयों और भौजाइयों से फिर सामना हुआ।

रांझा के भाई कहने लगे, ‘रांझा, क्या हो गया तुमको। हमारी पत्नियाँ तुम्हारे लिए नौकरानी की तरह काम करती हैं और हम लोग तुम्हारे गुलाम हैं। क्यूँ घर छोड़कर जा रहे हो?”

भौजाइयाँ कहने लगीं, “हम खून के आँसू रोते हैं जब तुम हमें कड़वी बातें कहते हो। हमने तुम्हारे लिए क्या नहीं किया। अपनी जिंदगी, संपत्ति…सब कुछ तो तुम पर न्योछावर कर दिया।”

रांझा ने भौजाइयों को जवाब दिया, “मैं घर छोड़ने का मन बना चुका हूँ तो तुम लोग मुझे अपने इरादे से भटकाने की कोशिश क्यों कर रहे हो? बहुत दिनों से मुझे तख़्त हजारा के दाना-पानी से नफ़रत सी हो रही है। पहले तुम लोगों की जली-कटी सुनकर मेरा दिल जला। उसके बाद तुम सबने मुझे मेरे भाइयों से अलग करवा दिया और अब अपना असली रंग बदलकर मीठी-मीठी बातें कर रही हो। तुम सब अपने इरादों में सफल नहीं हो सकती। मैं तय कर चुका हूँ कि मुझे पिता का घर छोड़कर जाना है।”

इस तरह से रांझा तख़्त हजारा से चला गया।    आगे पढ़ें-

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हीर रांझा – 2 – रांझे के खिलाफ भाइयों की साजिश

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रांझा के सभी भाई मिलकर जमीन की माप-जोख करनेवाले काज़ी के पास गए और उसे रिश्वत देकर अच्छी जमीनों को आपस में बाँट लिया। बंजर और बेकार जमीन रांझे के हिस्से में आई। यह सब देखकर रांझा के दुश्मनों की खुशी का तो ठिकाना नहीं था।

अब वे समाज में घूम-घूम कर कहने लगे कि अब रांझा को भाइयों ने जाल में अच्छा फांसा है। रांझा को भी वो अपमानित करते हुए कहते थे, “यह आदमी खेत कैसे जोत सकता है जिसके सर पर बड़े-बड़े बाल हैं लेकिन दिमाग में दही भरा है। ऐसे आदमी से कौन औरत शादी करेगी जो जिंदगी में कभी कुछ नहीं कर सकता।”

रांझा की बेइज्जती करने में भाई भी पीछे नहीं थे, वे कहते, “उसने तो औरतों की तरह चूड़ियाँ पहन रखी हैं। दिन भर बाँसुरी बजाता रहता है और रात भर गाता रहता है। अगर वह जमीन को लेकर लड़ने आता है तो आने दो। देखते हैं कि क्या कर लेता है? हम सब की ताकत के आगे वह अकेला कुछ नहीं कर सकता।”

रांझा भारी दिल लिए अपने बैलों को लेकर खेत जोतने चला लेकिन उसकी आत्मा रो रही थी और धूप की तल्ख़ी उसके दुख को और बढ़ा रही थी। खेत जोतते हुए जब थक गया तो वह छाया में जाकर लेट गया और आराम करने लगा।

उसकी भौजाई साहिबा उसके लिए खाना लेकर आई और वह अपना दर्द उससे कहने लगा, “भौजी, मुझे खेत जोतना अच्छा नहीं लग रहा। जमीन बहुत कठोर है। मेरे हाथों में फफोले और पैरों में छाले पड़ गए हैं। पिताजी जिंदा थे तो कितने अच्छे दिन थे। जाने वे कहाँ चले गए और ये बुरे दिन मुझे देखने पड़ रहे हैं।”

साहिबा ताना मारते हुए बोली, “वैसे तुम तो बस अपने पिता के ही दुलारे थे। माँ के लिए तुम शर्मसार करने वाले बेटे थे।”आगे कहानी पढ़ें

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