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माहवारी के चार दिन पहाड़ की लड़कियों के लिए नर्क हैं, पहाड़ की बेटी ने लिखी अपनी कहानी

कभी-कभी जब मन बहुत से सवालों में उलझ सा जाता है तब बस यूं ही अपनी बातें कागज पर उतार लेती हूं। उत्तराखंड की संस्कृति और परंपरा में कई खूबियां इसकी पहचान हैं और पहाड़ों की ठंडी हवा, खूबसूरत नजारे…उसी उत्तराखंड के एक छोटे से जिले की मैं एक मामूली सी लड़की हूं।

पहाड़ों में रहकर यहां की संस्कृति सीखी, परंपरा जानी और इन सबसे प्यार भी बहुत है लेकिन यहां औरतों की दशा देखकर मन बहुत उदास सा है। समस्याएं अनेक हैं। जैसे एक बात कहना चाहूंगी कि माहवारी या पीरियड्स के दौरान छुआछूत जैसी चीजें अजीब लगती हैं। महीने के उन चार दिनों में जैसे हमसे जीने का हक छीन लिया जाता है। स्कूल में पढ़ाया गया कि माहवारी या पीरियड्स सिर्फ एक शारीरिक प्रक्रिया है, गंदगी या छुआछूत जैसी चीज नहीं है।

एक तरफ जहां मैं ये सब पढ़ रही थी तो वहीं अपने घर में अजीब सा छुआछूत देखने को मिला। मैं हमेशा इस सवाल से जूझती रही कि क्या सच में इसमें छुआछूत जैसी कोई चीज होती है, क्या ये इतनी बुरी चीज है जो अब शादी के बाद भी इस छुआछूत को ससुराल में झेलना पड़ता है।

दस्तूर भी अजीब सा है कि यह वही औरत होती है जो हर वक्त बिना ब्रेक लिए सबकी खिदमत में हाजिर होती है, उसे पीरियड्स के चार दिनों के दौरान अलग बिस्तर और बर्तन थमा दिया जाता है जबकि वो इन दिनों में थोड़ी कमजोरी से गुजरती है और उसे ध्यान रखने वाला चाहिए होता है। इन चार दिनों के दौरान उसे कोई नहीं छूता, उसे हीन नजरों से देखते हैं मानों कोई पाप कर बैठी हो।

शायद सबको लगे कि ये क्या टॉपिक है पर एक लड़की की फीलिंग है। सबको लगेगा कि चार दिन की ही तो बात होती है पर ऐसे कोई भी लड़का एक दिन भी बिताकर देखे..दर्द में अकेले रोते हुए और ये दर्द भी ससुराल को नखरे लगने लगते हैं, जब उसे कोई छुए न, अलग बर्तन थमा दिए जायें, अलग बिस्तर दे दिया जाय…बस इस जिंदगी को एक दिन जीकर देखो कैसा लगता है तो शायद यह टॉपिक छोटा नहीं लगेगा। कोई तो होगा, मेरी तरह जो कहे कि उन चार दिनों में भी औरतों को जीने दो..

हम पढ़-लिख गए, समझ भी गए कि ये सब गंदगी नहीं, बॉडी में आए चेंज हैं लेकिन उसके बाद भी जाने क्यों इन चार दिनों में झूठे समाज की झूठी सी बातों में हम आ जाते हैं और उन सब छुआछूत को मानने से इनकार नहीं कर पाते। उन चार दिनों में हम खेतों में तो काम कर सकते हैं लेकिन घर के अंदर नहीं जा सकते, बिस्तर में नहीं सो सकते, किचन में नहीं जा सकते, कोई हमें छू नहीं सकता…

ससुराल में माहवारी के इन चार दिनों में बेटी और बहू के बीच फर्क किया जाता है। जब बेटी को हो तो वो कुछ नहीं और जब बहू को हो तो वो छुआछूत..आखिर क्यों..क्या बहू बेटी नहीं है किसी की…कहने को बहुत कुछ है पर नहीं कह पाऊंगी लेकिन इतना जरूर कहूंगी कि जिस-जिस तक मेरी बात पहुंचे वो अपनी फैमिली में बहू को वो चार दिन सामान्य तरीके से जीने दें तो बड़ी बात होगी और एक नई सोच का समाज में विकास होगा। शायद आने वाले वक्त में माहवारी के दौरान छुआछूत की बेवकूफी भरी बातें कम हो जाएं। अंधविश्वासों की वजह से हर महीने जिंदगी के वो चार दिन लगता है जैसे हम जिंदा नहीं है…

शायद ये परंपरा बन गई है इन खूबसूरत पहाड़ों की, और भी बहुत सी जगहों पर ये होगी पर अब इसे खत्म होना चाहिए। जीने का हक तो सबको है फिर कोई कैसे किसी की जिंदगी के हर महीने में चार दिन कम कर सकता है…अच्छे बदलाव होने चाहिए इन पहाड़ों में और अन्य जगहों पर भी और बदलना पहले खुद को पड़ेगा।

चली हूं थोड़ी सी जमीं पर अभी
आसमां की उड़ान बाकी है
जीतना चाहती हूं मैं भी मगर
बस एक बदलाव बाकी है

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